महाभारत काल का एक व्यक्ति जिसके बारे में यह माना जाता है कि वह आज भी जिंदा है। इस व्यक्ति का नाम है अश्वत्थामा। यह कौरव और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था। इसने महाभारत के युद्घ में कौरवों की ओर से युद्घ किया था।

हिंदू महाकाव्य में महाभारत, अश्वत्थामा या द्रौनी गुरु द्रोण के पुत्र और ऋषि भारद्वाज के पोते हैं। अश्वत्थामा एक महारथी हैं जिन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध में पांडवों के खिलाफ कौरव पक्ष में लड़ाई लड़ी थी। भगवान कृष्ण द्वारा दिए गए एक श्राप के कारण वह चिरंजीवी बन गए |
अश्वत्थामा का जन्म:अश्वत्थामा का जन्म द्वापरयुग में हुआ था। इनके पिता के नाम द्रोणाचार्य और माता का नाम कृपी था। द्रोणाचार्य को लम्बे समय तक कोई पुत्र प्राप्ति नहीं हुई तो वे भटकते भटकते हिमाचल की वादियों में पहुंच गए और वहां उन्होंने तपेश्वर महादेव की पूजा अर्चना की भगवान् शिव से पुत्र रत्न प्राप्ति का वर प्राप्त किया। जिसके कुछ दिन बाद उनको एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसने जन्म लेते ही अश्व की तरह गर्जना की और आकाशवाणी हुई की इसका नाम अश्वत्थामा होगा। क्योंकि उनकी गर्जना से चारों दिशाएं गूँज उठी थी। अश्वत्थामा के जन्म के बाद द्रोणाचार्य की आर्थिक स्तिथि बहुत ही दयनीय हो गयी थी। उनके घर पिने तक दूध तथा खाने को अन्न तक नहीं मिलता था। अंत में द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर जाने का निश्चय किया। वहां आकर उसने कौरवों और पांडवों को शास्त्र और शस्त्र विद्या सिखाई तथा इनके साथ ही अश्वत्थामा को भी पढ़ाया।
वीर योद्धा अश्वत्थामा: अश्वत्थामा वीर योद्धा था और श्रेष्ठ धनुर्धारी था। लेकिन उसने एक गलती की थी उसने कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ा। उसके पिता द्रोणाचार्य भी कौरवों की तरफ से लड़ रहे थे। अश्वत्थामा को पांडवों को हराने के लिए कौरवों की जरुरत नहीं थी बल्कि वो अकेला ही उन सब पर भारी था। तथा युद्ध में एक बार द्रोणाचार्य तथा अश्वत्थामा दोनों पांडवों पर भारी पड़ गए थे।
पिता की हत्या- गुरु द्रोणाचार्य वध:महाभारत युद्ध मे गुरु द्रोणाचार्य अकेलेही पांडवों पर भारी पद रहे थे। तब श्रीकृष्ण ने सोचा की इनको बल से नहीं छल से रोका जा सकता है। श्रीकृष्ण तुरंत भागकर धर्मराज युधिष्ठिर के पास गए और कहा की आप गुरु द्रोण से कहो की अश्वत्थामा मर गया। पहले तो युधिष्ठिर तैयार नहीं हुआ लेकिन श्रीकृष्ण के समझने पर बाद में उसने तेज आवाज में घोषणा की अश्वत्थामा युद्ध में मारा गया। इतना सुनते ही द्रोणाचार्य दौड़े और धर्मराज युधिष्ठिर के पास जाकर बोले क्या यह सत्य है की जो अभी तुमने बोला। तो युधिष्ठिर ने कहा हाँ सत्य है लेकिन अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया। जब युधिष्ठिर ने हाथी का नाम लिया उस वक्त श्रीकृष्ण ने शंख बजा दिया जो हाथी का नाम द्रोणाचार्य को सुनाई नहीं दिया। द्रोणाचार्य को बहुत ज्यादा दुःख हुआ तथा दुखी होकर उन्होंने अपने हथियार डाल दिए। उनको निहत्था देखकर शिखंडी ने उनका सर धड़ से अलग कर दिया।
श्रीकृष्ण का श्राप : श्रीकृष्ण ने कहा की ये जो तुम्हारे माथे पर मणि है इसको तुम निकाल दो अब तुम इसको धारण करने के लायक नहीं रहे। मणि अश्वत्थामा के जन्म से उसके माथे पर लगी हुई थी जो उसका सुरक्षा कवच था। इतना सुनते ही अश्वत्थामा घबरा उठा और भागने की कोशिश करने लगा। लेकिन श्रीकृष्ण ने जबरदस्ती उसकी मणि निकल ली और उसको श्राप दे दिया की वह 5000 सालों तक इस पृथ्वी पर बेसहारा विचरण करता रहेगा और कोई उसको खाने को अन्न तक नहीं देगा।
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ReplyDeleteअदभुत
ReplyDeleteGreat,nice,mst,jhhakkash
ReplyDeleteNice story
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